
POSH एक्ट, जिसका पूरा नाम कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 है, 9 दिसंबर 2013 को भारत सरकार द्वारा लागू किया गया कानून है। इसे आमतौर पर Prevention of Sexual Harassment at Workplace (POSH) कहा जाता है। यह कानून महिलाओं को कार्यस्थल पर सुरक्षित रखने, यौन उत्पीड़न की शिकायतों का निवारण करने और उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है। इसका दायरा ऑफिस, एनजीओ, सरकारी कार्यालय, स्कूल, अस्पताल, फैक्ट्रियों और असंगठित क्षेत्र से लेकर वर्क फ्रॉम होम या वर्चुअल वर्कप्लेस तक सभी जगहों पर लागू होता है।
POSH एक्ट क्यों आवश्यक है?
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न महिलाओं के मानसिक स्तर पर गहरा आघात पहुँचाता है, जिससे चिंता, अपर्याप्तता की भावना, नींद और भूख में भी गड़बड़ी हो सकती है। शारीरिक रूप से भी तनाव से सिरदर्द, उच्च रक्तचाप, अनिद्रा जैसी समस्याएं बढ़ती हैं। POSH एक्ट ने इस समस्या को गंभीरता से लिया और इसके लिए एक विशेष, स्वतंत्र शिकायत प्रणाली बनाई है। यह महिलाओं को बिना डर के काम करने, प्रमोशन के लिए आवाज उठाने और अपने करियर को बिना भेदभाव के आगे बढ़ाने का अवसर देता है। हालिया
के अनुसार किसी भी देश ने महिलाओं के लिए पूर्ण कानूनी समानता प्राप्त नहीं की है, जिससे ऐसे कानूनों की भूमिका और भी अहम हो जाती है।
POSH एक्ट का दायरा और लागू होने वाले क्षेत्र
इस कानून का दायरा बहुत व्यापक है। यह न केवल बड़े निजी कॉर्पोरेट ऑफिसों, बैंकों और एमएनसी के लिए लागू है बल्कि नन्हे स्कूलों, छोटे क्लिनिक, दुकानों, फैक्ट्रियों और घरेलू कर्मचारियों तक भी लागू माना जाता है। यह फुल–टाइम, पार्ट–टाइम, कॉन्ट्रैक्ट वर्कर, टेम्पोररी वर्कर, इंटर्न, ट्रेनी और वर्क फ्रॉम होम या रिमोट वर्क से जुड़े महिला कर्मचारियों को भी संरक्षण प्रदान करता है। हालाँकि, यह कानून विशेष रूप से महिलाओं की सुरक्षा पर केंद्रित है, इसलिए इसका प्राथमिक लाभ इसी वर्ग को मिलता है। इसके कारण भी, आज भारत में लिंग समानता को बढ़ावा देने के लिए POSH जैसी कानूनी तंत्र की बात अक्सर चर्चा में रहती है।
जैसे लेखों से यह भी पता चलता है कि कार्यस्थल और घर की सुरक्षा का जुड़ाव कैसे है।
POSH के तहत यौन उत्पीड़न की परिभाषा
POSH एक्ट के अंतर्गत यौन उत्पीड़न को “अनचाहे” यौन व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें निम्नलिखित हरकतें शामिल हैं:
- शारीरिक स्पर्श या अग्रिम: कंधे पर हाथ रखना, गले लगाना, छूना या ऐसी कोई भी अनचाही शारीरिक निकटता जो महिला को असहज करे।
- यौन टिप्पणियां या टेक्स्ट/ऑनलाइन संदेश: वीडियो कॉल, ईमेल, WhatsApp या किसी भी प्लेटफॉर्म पर ऐसी भाषा जो यौन स्वरूप रखती हो।
- प्रमोशन या कार्य–संबंधित लाभ के नाम पर यौन लाभ की मांग: जॉब, प्रमोशन, BOGIES, खाली पद या बोनस आदि के लिए बदले में यौन अनुनय या दबाव डालना।
- अश्लील फोटो, वीडियो या अन्य यौन सामग्री भेजना या दिखाना: ईमेल, मैसेज, WhatsApp या ऑफिस कंप्यूटर से ऐसी चीजें शेयर करना, जो अनुचित और अस्वीकार्य हों।
यदि ऐसा व्यवहार अनजाने में या “जोक” के तौर पर भी होता है, तो भी यह POSH के तहत शिकायत के योग्य माना जा सकता है, बशर्ते वह व्यक्ति उसे अस्वीकार करती हो और उससे प्रभावित महसूस करती हो।
POSH एक्ट की मुख्य प्रावधान
इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) की संरचना
POSH एक्ट का मुख्य प्रावधान यह है कि 10 या अधिक कर्मचारियों वाले हर संगठन में इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) बनाई जाए। यह कमेटी यौन उत्पीड़न शिकायतों को सुनने, जांच करने और अनुशंसा देने के लिए जिम्मेदार होती है। ICC की संरचना इस प्रकार होती है:
- प्रेसिडिंग ऑफिसर: आमतौर पर किसी वरिष्ठ महिला कर्मचारी या HR लीडर को बनाया जाता है, जो प्रक्रिया को नियंत्रित करती है।
- कम से कम दो कर्मचारी सदस्य: ऑर्गनाइजेशन के अन्य सदस्य जो शिकायत के संदर्भ में निष्पक्ष रह सकें।
- एक बाहरी सदस्य: आमतौर पर किसी एनजीओ से जुड़े व्यक्ति या विधि विशेषज्ञ, जो खास रूप से महिला सुरक्षा और POSH से जुड़े हों।
ICC का काम निष्पक्ष जांच करना, दोनों पक्षों को सुनना और परिणाम निष्कर्ष तैयार करना होता है।
POSH शिकायत प्रक्रिया का विस्तार
POSH एक्ट शिकायत प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाता है, ताकि डर या शर्म के कारण महिलाएं चुप न रहें। इसमें निम्नलिखित चरण शामिल हैं:
- लिखित शिकायत दर्ज करना: यदि कोई महिला कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का शिकार होती है, तो उसे अपनी शिकायत ICC को लिखित रूप में देनी होती है। आमतौर पर यह शिकायत घटना के 3 महीने के अंदर दर्ज की जानी चाहिए। हालांकि विशेष कारणों में ICC इस अवधि को और 3 महीने तक बढ़ा सकती है।
- ICC द्वारा शिकायत की प्रारंभिक जांच: ICC शिकायत की वैधता जांचती है, दोनों पक्षों से सबूत और बयान लेती है और गोपनीयता बनाए रखती है।
- 90 दिनों में जांच पूरी करना: नियमानुसार जांच 90 दिनों में समाप्त होनी चाहिए।
- रिपोर्ट का प्रस्तुतीकरण: जांच पूरी होने के 10 दिनों के अंदर ICC रिपोर्ट एम्प्लॉय
POSH एक्ट का समाज पर सकारात्मक प्रभाव
POSH एक्ट ने भारतीय समाज पर कई स्तरों पर सकारात्मक और दीर्घकालिक प्रभाव डाला है। सबसे पहले, इसने कार्यस्थल पर महिलाओं की हिम्मत बढ़ाई है। पहले कई महिलाएं डर या शर्म के कारण यौन उत्पीड़न की शिकायत नहीं कर पाती थीं, लेकिन अब POSH एक्ट और ICC की उपलब्धता के कारण अधिक महिलाएं आगे आकर अपनी बात कहने की हिम्मत कर पा रही हैं। इससे कार्यस्थलों पर “डर का माहौल” कम होकर “सुरक्षा और सम्मान का माहौल” बना है।
दूसरा, POSH एक्ट ने संगठनों के आंतरिक जलवायु पर अच्छा असर डाला है। कंपनियों, स्कूलों और सरकारी कार्यालयों को मजबूरन POSH जागरूकता सत्र करने और अपने कर्मचारियों को ICC, शिकायत प्रक्रिया और यौन उत्पीड़न की परिभाषा के बारे में सिखाना पड़ता है। इससे न केवल बुरे व्यवहार कम होते हैं, बल्कि नए कर्मचारी भी पहले दिन से ही जान जाते हैं कि “क्या अनुचित है” और “कहां शिकायत करनी है”, जिससे संस्कृति सुधरती है।
तीसरा और बहुत महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि POSH एक्ट ने लिंग समानता और समान अवसरों की ओर बढ़ने में मदद की है। जब महिलाएं जानती हैं कि उनके अधिकार कानून द्वारा संरक्षित हैं, तो वे नौकरी, प्रमोशन और जिम्मेदारी संभालने में ज्यादा सक्रिय होती हैं। इससे न केवल उनका व्यक्तिगत विकास तेजी से होता है, बल्कि संगठन की उत्पादकता और नवाचार में भी वृद्धि होती है।
अंत में, POSH एक्ट ने समाज के भीतर जागरूकता और विचारों को बदलने में योगदान दिया है। पहले कई लोग यौन उत्पीड़न को “छोटी‑मोटी बात” या “जोक” समझते थे, लेकिन अब यह जानकारी फैल चुकी है कि ऐसा व्यवहार कानूनी रूप से गंभीर अपराध हो सकता है। इससे युवा पीढ़ी में सहज रूप से सम्मानपूर्ण व्यवहार और लिंग संवेदनशीलता की भावना बढ़ती है, जो दीर्घकाल में पूरे समाज को सुरक्षित और न्यायसंगत बनाने में मदद करती है।
